Friday, February 12, 2010

सत्य और मान्यताये .

दोस्तों,
सबसे पहले मैं ये बताना चाहूँगा की सत्य क्या है, मैंने के बार लोगो से पूछा की सत्य क्या है,
किसी ने कहा, मेरी भगवन सत्य हैं, तो किसी ने कहा, मेरा धर्म सत्य है, किसी ने कहा मैं जो करता हु वो सत्य हैं, तो किसी ने गीता को सत्य बताया तो , किसी ने कुरान को ।
दोस्तों, में ये साफ कहना चाहूँगा की जहाँ भी ये कहा जाये की तुम इसे मान लो, तो साथियो मैं आपको सचेत करना चाहूँगा की यदि तुम सत्य को जानना चाहते हो तो उसी वक़्त संभल जाओ, क्योंकि वो सत्य नहीं हो सकता, ये हमारी धर्नाये हो सकती हैं, मान्यताये हो सकती है , सत्य नहीं हो सकती , क्योंकि सत्य कभी किसी विशेष प्राणी या समुदाय विशेष के लिए नहीं हो सकता, सत्य किसी आस्था या मान्यताये का मोहताज़ नहीं होता, उसे कोइ ये नहीं कह सकता की तुम इस पे विस्वास करो, या फिर उसे मान लो। क्योंकि सत्य तो अपने आप में एक विस्वास है उसे किसी विस्वास या मान्यताये किस जरुरत नहीं होता, सत्य हमेशा कहता है, मेरे करीब आओ मुझे जानो, विस्वास तो तुम खुद करोगे,

दोस्तों उपर जो कुछ भी कहा गया है वो मनाय्ताये हो सकती है सत्य नहीं, दोस्तों हमारी सबसे बड़ी कमजोरी ये होती है की हम सत्य को जानने या समझने की कोसिस नहीं करते, हमे जो भी बताया जाता हम उसे उसी रूप में मान लेते है, दोस्तों यदि किसी के लिए भगवान्/अल्लाहः/ईशा सत्य है, किसी के लिए पूजा सत्य है , तो किसी के लिए महज एक दिखावा। यदि ये सत्य है, तो आग का तपिस, पानी का ठंडक को आप क्या कहेंगे, जो कर किसी को जला सकती है, उसके लिए कोइ इंसान कोइ सतैतान नहीं होता, चाहे आपका हाँथ जाने में आग में गए या फिर अनजाने में उसमे जलन तो होगी, क्योंकि आग तपिस एक सत्य हैं, चाहे वो एक भिखारी का हाँथ हो या फिर किसी राजा के, कोइ हिन्दू के हो या फिर किसी मुसलमान के, वो एक इंसान के हो क्या किसी जानवर के, वो विना किसी भेद भाव के हर किसी से एक जैसा हरकत करेगी, और मेरे ख्याल से सत्य की यही सब्सी बड़ी पह्काहं होती है।

No comments:

Post a Comment